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पितृपक्ष विशेष…… अदृश्य जगत की सत्ता होती है पितरों के पास : पंडित कुश उपाध्याय

अलीगढ। सनातन धर्म में पूर्वजों को समर्पित 16 दिवसीय पितृ पक्ष प्रारंभ हो चुका है जिसके तहत बुधवार को दूसरा यानि प्रतिपदा का श्राद्ध किया गया।अपने पूर्वजों के प्रति आस्था और निष्ठा दिखाने का तर्पण एवं श्राद्ध किसी व्यक्ति के लिए कितना आवश्यक है और हमारे दैनिक जीवन में श्राद्ध और तर्पण एवं जलदान का कितना महत्व है इसकी जानकारी वैदिक ज्योतिष संस्थान के पंडित कुश उपाध्याय ने दी।

पंडित कुश उपाध्याय के अनुसार सूर्य देव के कन्या राशि मे विचरण के साथ ही श्राद्ध पक्ष का आरंभ हो जाता है क्योंकि पितृलोक पृथ्वी के निकट आ जाता है। श्राद्ध दो तिथियों पर किए जाते हैं, प्रथम मृत्यु या क्षय तिथि पर और द्वितीय पितृ पक्ष में जिस मास और तिथि को मृत्यु हुई है अथवा जिस तिथि को उसका दाह संस्कार हुआ है। वर्ष में उस तिथि को एकोदिष्ट श्राद्ध में केवल एक पितर की संतुष्टि के लिए श्राद्ध किया जाता है। इसमें एक पिंड का दान और एक ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है। पितृपक्ष में जिस तिथि को पितर की मृत्यु तिथि आती है, उस दिन पार्वण श्राद्ध किया जाता है। पार्वण श्राद्ध में 9 ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है, किंतु शास्त्र किसी एक सात्विक एवं संध्यावंदन करने वाले ब्राह्मण को भोजन कराने की भी आज्ञा देते हैं।

पंडित कुश उपाध्याय ने श्राद्ध के प्रति आधुनिक सोच रखने वाले व्यक्तियों का खंडन करते हुए कहा कि जिस तरह इस सृष्टि में हर वस्तु का सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष जैसे रात और दिन, अँधेरा और उजाला, अमीर और गरीब इसी तरह दृश्य और अदृश्य जगत का भी जोड़ा है। दृश्य जगत वो है जो हमें दिखता है और अदृश्य जगत वो है जो हमें नहीं दिखता। ये भी एक-दूसरे पर निर्भर है और एक-दूसरे के पूरक हैं। पितृ-लोक भी अदृश्य-जगत का हिस्सा है और अपनी सक्रियता के लिये दृश्य जगत के श्राद्ध पर निर्भर है। धर्म शास्त्रों में कहा गया है हानि,लाभ, जीवन,मरण,यश,अपयश विधि हाथ यह सभी सुख हमें पितरों की आराधना से ही मिलते हैं अतः पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है।




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