कार्तिक महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि पर होता है भगवान शिव और विष्णु का मिलन: शीलेन्द्र

 कार्तिक महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि पर होता है भगवान शिव और विष्णु का मिलन: शीलेन्द्र



सिकंदराराऊ

नगर के कथा व्यास एवं ज्योतिषाचार्य पंडित शीलेंद्र कृष्ण दीक्षित ने बताया कि बैकुंठ चतुर्दशी पर हरि-हर मिलन कल, भगवान शिव और विष्णु की पूजा एक साथ कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी रविवार को मनाई जाएगी। इसे बैकुंठ चतुर्दशी भी कहते हैं। इसी रात में हरिहर मिलन होगा। हरि यानि भगवान विष्णु और हर मतलब भगवान शिव। इस दिन शिवजी भगवान विष्णु को सृष्टि के संचालन का कार्यभार सौंपेंगे।

उन्होंने बताया कि बैकुंठ चतुर्दशी 2022 पूजा मुहूर्त 06 नवंबर को बैकुंठ चतुर्दशी की निशिता काल पूजा का शुभ समय रात 11 बजकर 45 मिनट से देर रात 12 बजकर 37 मिनट तक है । इस समय में सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग भी लग रहा है. 06 नवंबर को देर रात 12 बजकर 04 मिनट से 07 नवंबर को सुबह 06 बजकर 37 मिनट तक सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग बना है। 

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान विष्णु चातुर्मास के दौरान देवशयनी ग्यारस से देवउठनी ग्यारस तक शिव को संपूर्ण जगत की राजसत्ता सौंपकर क्षीरसागर में विश्राम करने जाते हैं। बैकुंठ चतुर्दशी पर ये सत्ता फिर शिवजी भगवान विष्णु को सौंपते हैं।

 उन्होंने कहा कि क्या है हरि-हर मिलन की परंपरा स्कंद, पद्म और विष्णुधर्मोत्तर पुराण के मुताबिक कार्तिक महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि पर भगवान शिव और विष्णुजी का मिलन करवाया जाता है। रात में दोनों देवताओं की महापूजा की जाती है। रात्रि जागरण भी किया जाता है। चातुर्मास खत्म होने के साथ भगवान विष्णु के योग निद्रा से जागते हैं और इस मिलन पर भगवान शिव सृष्टि चलाने की जिम्मेदारी फिर से विष्णु जी को सौंपते हैं। भगवान विष्णु जी का निवास बैकुंठ लोक में होता है। इसलिए इस दिन को बैकुंठ चतुर्दशी भी कहते हैं। इस दिन सुबह जल्दी नहाकर दिनभर व्रत रखने का संकल्प लें। दिनभर बिना कुछ खाए मन में भगवान के नाम का जप करें।

रात में कमल के फूलों से भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए।

इसके बाद भगवान शंकर की भी पूजा करें। पूजा के लिए मंत्र ऊँ शिवकेशवाय नम:, ऊँ हरिहर नमाम्यहं का प्रयोग करें। 

श्री दीक्षित ने कहा कि रात भर पूजा करने के बाद दूसरे दिन फिर शिवजी का पूजन कर ब्राह्मणों को भोजन करवाना चाहिए। इसके बाद खुद भोजन करना चाहिए। बैकुंठ चतुर्दशी का ये व्रत शैवों और वैष्णवों की पारस्परिक एकता का प्रतीक है।

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